मैं आज भी गूंगा बैठा हूं

तब भी किस्सा कुर्सी का था
आज भी कुर्सी का है चक्कर
तब भी हिन्दू मुस्लिम में देश बटा
आज भी हिन्दू मुस्लिम का मुद्दा है
मारा गया तब भी मैं था
आज भी मैं ही कत्ल होता हूँ
बटवारा ना तब मैंने था मांगा
ना आज ही मैं चाहता हूं बटना
यह कौन सी आज़ादी है
यह कैसे आए हैं अच्छे दिन
मैं तब भी मूक देखता रहा
मैं आज भी गूंगा बैठा हूँ

तुम करते रहो तय तारीख़ आज़ादी की
मुझे तब भी धर्म जात से जकड़ा था
मैं अब भी धर्म जात में बांधा जाता हूँ
प्यार, शांति, खुशहाली, हो रोज़ ईद और दिवाली
मेरा यह सपना तब भी टूट के बिखरा था
यह सपना आज भी तुमने कुचला है
भव्यता देश की मैं क्या जानू
मैं दो रोटी को भी तरसा हूँ
है व्यर्थ जगमगाते लाख दिए तुम्हारे
जब आग नहीं चूल्हे में मेरे
कैसे मानूं तुम्हें विश्वगुरु जयगान तुम्हारे गाउं
शिक्षा, रोज़गार जब तक ना हर घर में हो

तुम तय करते रहो तारीख आज़ादी की
कुछ पागल मस्ताने थे मां पर जो बलिदान हुए
आज उन बलिदानों को भी  तुम आकते  हो
मुझे गांधी और भगत सिंह में बांटते हो
सत्ता की सभा में तब भी मैं नीलाम हुआ
आज भी सत्ता की शतरंज का मोहरा हूं
मैं तो उस दिन जशन मनाऊंगा
पेट भरा हो, सर पर छत हो, न कलह हो
स्वच्छ हवा हो, निर्मल मन हो, स्वप्न सजा हो
नफ़रत की न फसल उगे, हरा केसरी न रंग बटे

©Charu Gupta and Potpourri of Life

एक रह चुनी है मैंने

एक राह चुनी है मैंने,
जहां भीड़ बड़ी कम थी।
छांव को दरख़्त नहीं,
मिट्टी थोड़ी नम थी।
कुछ शोर यहां से चीखा,
“बेवकूफ़ हो, कुछ नहीं कर पाओगे”
कुछ आवाजें वहां से आईं,
“चलते रहो, कुछ मन का कर जाओगे”
एक ने ज़िद्द बढ़ाई, दूसरे ने हिम्मत,
मेरे इरादों की बुलंदी को दोनों ही काम आए!

©charu gupta and potpourri of life.